iPhone VS Android Phone /कौन है ज्यादा सुरक्षित और किसमें है ज्यादा इंटेलिजेंट पर्सनल असिस्टेंट?

आप जब भी एक बेस्ट स्मार्टफोन खरीदने की योजना बनाते हैं तो आपके सामने जो सबसे मुश्किल सवाल आता है वह है कि आईफोन लें या एंड्रॉयड? दोनों ही फोन बेहतरीन फीचर्स से लैस होते हैं, इसलिए दोनों में से किसी एक को चुनने का फैसला लेना काफी मुश्किल हो जाता है। आम स्मार्टफोन यूजर इन दोनों के बीच कीमत और ब्रांड का ही अंतर समझ पाते हैं और ऐसा समझते हैं कि फीचर्स लगभग समान ही हैं। हालांकि गौर करने पर इन दोनों के फीचर्स के फर्क को समझा जा सकता है और उसके आधार पर यह फैसला लिया जा सकता है कि एंड्रॉइड फोन लेना बेहतर होगा या आईफोन।

कुछ पॉइंट्स के आधार पर दोनों की तुलना

  1. मजबूत हार्डवेयर

    आईफोन के हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर पर एपल का पूरा कंट्रोल होता है। वहीं गूगल बड़े फोन निर्माताओं जैसे सैमसंग, एचटीसी, एलजी और मोटोरोला को एंड्रॉयड सॉफ्टवेयर ऑफर करता है। यही वजह है कि एंड्रॉइड फोन अलग-अलग साइज, वजन, फीचर्स और क्वालिटी में उपलब्ध होते हैं। प्रीमियम एंड्रॉइड फोन हार्डवेयर के मामले में आईफोन की टक्कर के होते हैं लेकिन सस्ते एंड्रॉइड फोन में हार्डवेयर संबंधी समस्या आ सकती है।

  2. ओएस कम्पैटिबिलिटी

    हाल में लॉन्च हुआ आईओएस 12 आईफोन 5S और उसके बाद के सभी मॉडल्स को सपोर्ट करता है। आईओएस 11 भी अपनी रिलीज के महज 6 हफ्तों में ही 66% मॉडल्स में इंस्टॉल हो चुका था। दूसरी ओर अगस्त 2018 के पहले हफ्ते में रिलीज हुआ एंड्रॉइड 9 पाई 4 हफ्तों के बाद भी केवल 0.1% डिवाइसेज पर ही इंस्टॉल हो सका। इसी तरह एंड्रॉयड 8 रिलीज के 8 हफ्तों बाद केवल 0.2% और एंड्रॉइड 7 एक साल बाद भी केवल 18% डिवाइसेज पर ही काम कर रहा था। ऐसे में स्मार्टफोन में लेटेस्ट ओएस की चाहत रखने वालों के लिए आईफोन बेहतर साबित हो सकता है।

  3. ऐप्स का सिलेक्शन और कंट्रोल

    अप्रैल 2018 तक जहां एपल के एप स्टोर में 2.1 मिलियन ऐप्स थे वहीं गूगल प्ले में मौजूद ऐप्स की संख्या 3.5 मिलियन के करीब थी। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि ऐपल ऐप सिलेक्शन में सख्ती बरतता है। वहीं गूगल के स्टैंडर्ड काफी लचीले हैं। एपल का यह सख्त रवैया कई बुरी स्थितियों से यूजर्स को बचाता है। इसका एक बड़ा उदाहरण तब देखने को मिला जब गूगल प्ले पर व्हाट्सऐप का फेक वर्जन पब्लिश हुआ और उसे 1 मिलियन लोगों ने डाउनलोड कर लिया। इस तरह के उदाहरण आपकी सिक्योरिटी के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।

  4. इंटेलिजेंट असिस्टेंट

    एआई और वॉइस इंटरफेस के मामले में एंड्रॉयड आईफोन से आगे है। गूगल असिस्टेंट आपसे जुड़ी उस सारी जानकारी का इस्तेमाल करता है जिसे गूगल जानता है। उदाहरण के लिए अगर आपके गूगल कैलेंडर में 5 बजे की मीटिंग दर्ज है और उस समय से पहले ट्रैफिक बहुत ज्यादा है तो गूगल असिस्टेंट आपको जल्दी निकलने का नोटिफिकेशन भेजता है। वहीं एपल पर यूजर्स को सीरी असिस्टेंट मिलता है जो अपडेटेड आईओएस के साथ बेहतर तो हो रहा है लेकिन इसमें गूगल असिस्टेंट की तरह एडवांस्ड फीचर्स नहीं हैं। हालांकि गूगल असिस्टेंट आईफोन के लिए भी उपलब्ध है।

  5. बैट्री लाइफ

    पहले आईफोन की बैट्री को रोजाना चार्ज करने की जरूरत पड़ती थी लेकिन लेटेस्ट मॉडल कई दिनों तक बिना चार्ज किए काम कर सकते हैं। एंड्रॉइड में हार्डवेयर की अलग-अलग किस्मों के चलते बैट्री की स्थिति कुछ जटिल है। एंड्रॉइड के कुछ मॉडल 7 इंच की स्क्रीन और दूसरे फीचर्स के साथ आते हैं जिससे बैट्री की खपत ज्यादा होती है। लेकिन ऐसे भी कई मॉडल्स भी हैं जो यूजर्स को अल्ट्रा हाई कैपिसिटी की बैट्रीज ऑफर करते हैं। ऐसे में अगर आप एक बार चार्ज करने के बाद कई दिनों तक चलने वाली बैट्री वाला फोन खरीदना चाहते हैं तो एंड्रॉइड का चयन कर सकते हैं।

  6. सिक्योरिटी

    अगर आप सिक्योरिटी को ध्यान में रखकर स्मार्टफोन खरीदना चाहते हैं तो आपके लिए आईफोन से बेहतर कुछ नहीं है। एक स्टडी में यह पाया गया है कि मैलवेयर, वायरस, वर्म्स आदि के 97% मामले एंड्रॉयड में हुए हैं। जबकि, आईफोन में यह 0% था। आंकड़ों से साफ हो जाता है कि एंड्रॉयड की तुलना में आईफोन में मैलवेयर अटैक होने की संभावना बहुत कम होती है। इस लिहाज से वे ज्यादा सिक्योर होते हैं।

  7. जीपीएस 

    दोनों ही प्लेटफॉर्म्स थर्ड पार्टी जीपीएस ऐप्स को सपोर्ट करते हैं। एपल मैप्स केवल आईओएस के लिए उपलब्ध है। शुरुआती दौर में इसमें कुछ खास समस्याएं आई थीं लेकिन अब सुधार हुआ है और यह गूगल मैप्स की ही तरह आपको नैविगेशन में पूरी मदद करता है। अगर एपल मैप्स इस्तेमाल न करना चाहें तो गूगल मैप्स का इस्तेमाल कर सकते हैं क्योंकि यह दोनों ही प्लेटफॉर्म्स के लिए अवेलेबल है।

NEWS SOURCE-- DAINIK BHASKAR